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Module 2
प्राइसिंग और वैल्यूएशन (Pricing and Valuation)
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Chapter 3 | 2 min read

मुद्रास्फीति (inflation) और इसके बॉन्ड्स (bonds) पर प्रभाव

मान लो, एक शाम तुम खेती करने का निर्णय लेते हो और अगले फसल सीजन की योजना बनाना शुरू करते हो। बीज, खाद और उपकरणों की लागत इन्फ्लेशन (inflation) के कारण बढ़ जाती है, जिससे वही मात्रा में फसल उत्पादन महंगा हो जाता है।

इसी तरह, इन्फ्लेशन (inflation) फिक्स्ड इनकम इन्वेस्टमेंट्स (fixed income investments) जैसे बॉन्ड्स (bonds) से प्राप्त होने वाले पैसे की पर्चेज़िंग पावर (purchasing power) को कम कर देता है। यह समझना कि इन्फ्लेशन (inflation) बॉन्ड्स (bonds) को कैसे प्रभावित करता है, फिक्स्ड इनकम इन्वेस्टर्स (fixed income investors) के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन्फ्लेशन (inflation) बॉन्ड्स (bonds) पर वास्तविक रिटर्न (real return) को कम कर सकता है, भले ही वे नाममात्र रूप से उच्च ब्याज दर का भुगतान कर रहे हों।

इन्फ्लेशन (inflation) वह दर है जिस पर वस्तुओं और सेवाओं की सामान्य मूल्य स्तर बढ़ता है, जिससे पैसे की पर्चेज़िंग पावर (purchasing power) कम हो जाती है। बॉन्ड्स (bonds) के संदर्भ में, इन्फ्लेशन रिस्क (inflation risk) का तात्पर्य उस संभावना से है कि इन्फ्लेशन (inflation) आपके फिक्स्ड इनकम इन्वेस्टमेंट्स (fixed income investments) पर रिटर्न (return) को पार कर जाएगा, आपके ब्याज भुगतान और मूलधन वापसी के वास्तविक मूल्य को घटाएगा।

1. पर्चेज़िंग पावर (Purchasing Power) का क्षय:

फिक्स्ड इनकम सिक्योरिटीज (fixed income securities) एक नाममात्र रिटर्न (nominal return) का भुगतान करती हैं, जिसका मतलब है कि घोषित ब्याज दर इन्फ्लेशन (inflation) के बावजूद स्थिर रहती है। यदि इन्फ्लेशन (inflation) बढ़ता है, तो कूपन भुगतान और मूलधन वापसी का वास्तविक मूल्य कम हो जाता है। इसका मतलब है कि बॉन्ड की आय धारा की वास्तविक पर्चेज़िंग पावर (purchasing power) घट जाती है।

उदाहरण: अगर आप ₹1,000 का बॉन्ड रखते हो जिसमें 6% वार्षिक कूपन है, और इन्फ्लेशन (inflation) 8% तक बढ़ जाता है, तो आपके बॉन्ड पर वास्तविक रिटर्न (real return) नकारात्मक है। आपको अभी भी ₹60 प्रति वर्ष ब्याज के रूप में मिल रहे हैं, लेकिन इन्फ्लेशन (inflation) के कारण, उस ₹60 की पर्चेज़िंग पावर (purchasing power) पहले जितनी नहीं रही।

2. बॉन्ड प्राइस (Bond Prices) और इन्फ्लेशन अपेक्षाएं:

बढ़ती इन्फ्लेशन (inflation) आमतौर पर उच्च ब्याज दरों की ओर ले जाती है, क्योंकि केंद्रीय बैंक जैसे भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India - RBI) इन्फ्लेशन (inflation) से निपटने के लिए दरें बढ़ाते हैं। इससे बॉन्ड प्राइस (bond prices) गिरती हैं, क्योंकि निवेशक भविष्य के कूपन भुगतान की घटती वास्तविक मूल्य की भरपाई के लिए अधिक यील्ड्स (yields) की मांग करते हैं।

उदाहरण: यदि इन्फ्लेशन अपेक्षाएं बढ़ती हैं, तो नए बॉन्ड्स (bonds) निवेशकों को आकर्षित करने के लिए उच्च यील्ड्स (yields) प्रदान करेंगे। मौजूदा बॉन्ड्स (bonds) जिनकी यील्ड्स (yields) कम हैं, उनकी प्राइस (price) गिर जाएगी ताकि वे नए इश्यूज़ के साथ प्रतिस्पर्धी बन सकें।

3. फिक्स्ड बनाम इन्फ्लेशन-लिंक्ड बॉन्ड्स (Impact on Fixed vs. Inflation-Linked Bonds):

  • फिक्स्ड-रेट बॉन्ड्स (Fixed-rate Bonds): जैसा कि ऊपर वर्णित है, उच्च इन्फ्लेशन (inflation) की अवधि के दौरान ये बॉन्ड्स (bonds) कम आकर्षक हो जाते हैं क्योंकि उनकी फिक्स्ड ब्याज भुगतान वास्तविक रूप में मूल्य खो देते हैं।

  • इन्फ्लेशन-लिंक्ड बॉन्ड्स (Inflation-Linked Bonds): इन्फ्लेशन (inflation) के खिलाफ हेज करने के लिए, कुछ बॉन्ड्स (bonds) इन्फ्लेशन-लिंक्ड होते हैं, जिसका मतलब है कि उनके कूपन भुगतान और मूलधन मूल्य को इन्फ्लेशन माप जैसे कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (Consumer Price Index - CPI) के आधार पर समायोजित किया जाता है। ये बॉन्ड्स (bonds) इन्फ्लेशन (inflation) के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि निवेशक का रिटर्न (return) बढ़ती कीमतों के साथ बना रहे।

उदाहरण: भारत सरकार के इन्फ्लेशन-लिंक्ड बॉन्ड्स सीपीआई (CPI) से जुड़े रिटर्न्स (returns) प्रदान करते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि निवेशकों का वास्तविक रिटर्न (real return) इन्फ्लेशन (inflation) बढ़ने पर भी सुरक्षित रहे।

  1. रियल बनाम नाममात्र रिटर्न्स (Real vs. Nominal Returns): निवेशकों को नाममात्र रिटर्न्स (nominal returns) (घोषित ब्याज दर) पर नहीं, बल्कि वास्तविक रिटर्न्स (real returns) (इन्फ्लेशन के लिए समायोजित रिटर्न्स) पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। भले ही एक बॉन्ड (bond) 6% रिटर्न (return) प्रदान करता हो, अगर इन्फ्लेशन (inflation) 8% है, तो वास्तविक रिटर्न (real return) नकारात्मक है।

  2. इंटरेस्ट रेट रिस्क (Interest Rate Risk): इन्फ्लेशन (inflation) सीधे ब्याज दरों को प्रभावित करता है, और उच्च इन्फ्लेशन (inflation) अक्सर उच्च ब्याज दरों की ओर ले जाता है। इससे बॉन्डहोल्डर्स (bondholders) के लिए जोखिम बढ़ जाता है, क्योंकि बढ़ती दरें बॉन्ड प्राइस (bond prices) को कम करती हैं।

  3. पोर्टफोलियो स्ट्रेटेजी (Portfolio Strategy): निवेशकों को बॉन्ड पोर्टफोलियो (bond portfolio) बनाते समय इन्फ्लेशन (inflation) के प्रभाव पर विचार करने की आवश्यकता है। इन्फ्लेशन-लिंक्ड बॉन्ड्स (inflation-linked bonds) और अन्य उपकरण जो इन्फ्लेशन (inflation) के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, उच्च इन्फ्लेशन (inflation) के समय के लिए बेहतर हो सकते हैं।

इन्फ्लेशन (inflation) फिक्स्ड इनकम इन्वेस्टमेंट्स (fixed income investments) के मूल्य को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है, उनके वास्तविक रिटर्न्स (real returns) को कम कर सकता है और उच्च इन्फ्लेशन (inflation) के समय में उन्हें कम आकर्षक बना सकता है। बॉन्ड्स (bonds) पर इन्फ्लेशन (inflation) के प्रभाव को समझने से निवेशकों को बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलती है, विशेष रूप से इंटरेस्ट रेट रिस्क (interest rate risk) को प्रबंधित करते समय और पर्चेज़िंग पावर (purchasing power) को बनाए रखते समय। अगले अध्याय में, हम यील्ड और यील्ड कर्व एनालिसिस (Yield and Yield Curve Analysis) में गहराई से जाएंगे, जहां हम देखेंगे कि यील्ड्स (yields) बॉन्ड प्राइस (bond prices) से कैसे संबंधित हैं और फिक्स्ड इनकम इन्वेस्टिंग (fixed income investing) के संदर्भ में यील्ड कर्व (yield curve) को कैसे समझें।

This content has been translated using a translation tool. We strive for accuracy; however, the translation may not fully capture the nuances or context of the original text. If there are discrepancies or errors, they are unintended, and we recommend original language content for accuracy.

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